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एक स्वयंसेवक की कहानी

एक स्वयंसेवक की कहानी

राम पुनियानी

मुंबई से


श्री लालकृष्ण आडवाणी की आत्मकथा की समीक्षाएं लगभग सभी प्रकाशनों में आ चुकी हैं. श्री आडवाणी भारत की प्रजातांत्रिक राजनीति पर आरएसएस-भाजपा की संकीर्ण सोच को लादने के लिए जाने जाते हैं.


राममंदिर के मुद्दे पर उन्होंने ही आंदोलन खड़ा किया, रथयात्रा निकाली और बाबरी मस्जिद के ढहाए जाने के कारण बने. उनके जरिए ही भाजपा चुनाव रणभूमि में स्वतंत्रता के बाद पहली बार महत्वपूर्ण शक्ति के रूप में उभर सकी. एनडीए के शासन, गुजरात के कत्लेआम और देश को हिंदू राष्ट्र बनाने का अभियान - इन सभी में श्री आडवाणी की महत्वपूर्ण भूमिका थी. शायद इसलिए आरएसएस के महासचिव श्री मोहन भागवत ने इस पुस्तक के लोकार्पण समारोह में कहा कि श्री आडवाणी ने अपनी आत्मकथा एक स्वयंसेवक की हैसियत से लिखी है. यह तथ्य इस पुस्तक को समझने में तो हमारी मदद करेगा ही, वह हमें उस व्यक्ति के एजेंडे को समझने में भी मदद करेगा जो पिछले कई दशकों से संघ और भाजपा के प्रमुख नीति निर्धारकों में से एक रहा है.

सच का दावा

केन्द्रीय गृहमंत्री होने के बावजूद श्री आडवाणी की इस निर्णय में कोई भागीदारी नहीं थी कि श्री जसवंत सिंह आतंकवादियों को लेकर कंधार जाएं.


इस पुस्तक में यह शायद जान बूझकर लिखा गया है कि केन्द्रीय गृहमंत्री होने के बावजूद श्री आडवाणी की इस निर्णय में कोई भागीदारी नहीं थी कि श्री जसवंत सिंह आतंकवादियों को लेकर कंधार जाएं. यह झूठ जानते-बूझते लिखा गया है और इसका उद्देश्य यह बताना है कि श्री आडवाणी आतंकवाद से कड़ाई से निपटने के पक्षधर हैं और यह भी कि एनडीए सरकार की गलतियों और असफलताओं के लिए वे जिम्मेदार नहीं हैं. मजेदार बात यह है कि जहां श्री आडवाणी एनडीए सरकार की असफलताओं से स्वयं को दूर रखना चाहते हैं, वहीं वे उसकी कथित उपलब्धियों के लिए श्रेय लेने से नहीं चूकते.


महात्मा गांधी की मृत्यु पर श्री आडवाणी ने जिस तरह मगरमच्छी आंसू बहाए हैं वह काफी विडंबनापूर्ण जान पड़ता है. महात्मा गांधी की हत्या को श्री आडवाणी एक दुखद घटना बतलाते है परंतु वे यह लिखना भूल जाते हैं कि गांधीजी को मारने वाला उनके जैसा एक स्वयंसेवक नाथूराम गोड़से था. और यह भी कि गोड़से के राष्ट्रवाद की परिकल्पना और उनके खुद के राष्ट्रवाद में कोई खास अंतर नहीं है.


राममंदिर के मामले में भगवान राम को राष्ट्र की पहचान बनाने की कोशिश की गई थी. राममंदिर के मसले पर चर्चा करते हुए हिंदुत्व का यह अथक योद्धा कहता है कि वो धर्म राज्य के पक्षधर नहीं है. बहुत बहुत धन्यवाद, श्रीमान! इसके अलावा वे कह भी क्या सकते थे? जहां पूरा राष्ट्र भारत को एक बहुधार्मिक, बहुसांस्कृतिक और विविधताओं से भरे हुए देश के रूप में देखता है, वहीं आरएसएस ब्राहम्णवादी हिंदुत्व को देश पर थोपना चाहता है. भगवान राम को भारतीय राष्ट्रवाद के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करने की आडवाणी की कोशिश हास्यास्पद तो थी परंतु इसने उनके राजनैतिक हितपूर्ति में बहुत मदद की. इसका अंत सदियों पुरानी मस्जिद को ढहाए जाने और अल्पसंख्यकों के कत्लेआम में हुआ. इस पुस्तक में बाबरी विवाद को भी हिंदू कट्टरपंथी विचारधारा के चश्मे से देखा गया है.

 

आडवाणी कहीं यह चर्चा नहीं करते कि किस तरह अंग्रेजों ने हमारे देश को बांटने के लिए इतिहास का सांप्रदायिकीकरण किया था. रामजन्मभूमि के उसी स्थान पर होने, जहां कि बाबरी मस्जिद थी, को ''प्रमाणित'' करने के लिए जिन स्त्रोतों को आडवाणी उदृत करते हैं उन्हें पढ़कर कोई भी गंभीर इतिहासज्ञ हंसे बिना नहीं रह सकेगा परंतु यह सब उनकी राजनीति का अंग है.


बाबरी मस्जिद को आडवाणी भारतीय राष्ट्रवाद की आंखों की किरकिरी बताते हैं. शायद इतिहास की उनकी समझ उतनी ही है, जितनी आरएसएस के किसी स्वयंसेवक के लिए आवश्यक होती है. उन्हें कौन बताए कि राजाओं और नबाबों ने धार्मिक नहीं वरन् राजनैतिक कारणों से मस्जिदों और मंदिरों को नष्ट किया था. श्री आडवाणी शायद यह नहीं जानना चाहेंगे कि अयोध्या के सबसे बडे मंदिर हनुमानगढ़ी का निर्माण अवध के नबाब द्वारा दान की गई जमीन पर किया गया था. वे शायद यह भी जानने के इच्छुक नहीं होंगे की जिस औरंगजेब ने अनेक मंदिरों को नष्ट किया था उसी ने कई मंदिरों को बड़ी राशि दान भी की थी.


पुस्तक के गुजरात पर लिखे गए अध्याय से हम यह सीख सकते हैं कि कत्लेआम को प्रायोजित करने वाले अपने साथी स्वयंसेवक का किस तरह बचाव किया जाए. गुजरात की घटनाओं के बारे में सामने आए अनेक तथ्यों को नजरअंदाज करते हुए आडवाणी, मोदी की कार्यवाही को उचित ठहराते हैं. अगर गोधरा में ट्रेन में (मुसलमानों द्वारा) आग लगाई गई थी तो बेनर्जी समिति की रिपोर्ट क्या झूठ का पुलिंदा है? अगर गुजरात फॉरेंसिक प्रयोगशाला की रपट कहती है कि रेल के डिब्बों में बाहर से आग लगाना संभव नहीं था तो हमें इस रिपोर्ट की चर्चा ही क्यों करनी चाहिए? और वैसे भी, देश में हिंसा की इतनी घटनाएं होती रहती हैं कि केवल मोदी को कटघरे में खड़ा करना अनुचित होगा! गुजरात दंगों के बारे में विभिन्न मानवाधिकार संगठनों की रपटें कोरी बकवास के अलावा कुछ नहीं है. गुजरात में सब ठीक है. अगर उच्चतम न्यायालय गुजरात दंगों से संबंधित मामलों को राज्य से बाहर इस आधार पर स्थानांतरित कर रहा है कि गुजरात में न्याय होना संभव नहीं है, तो क्या?


संघ परिवार की रणनीति स्पष्ट है. पहले एक मध्यमार्गी, मीठा बोलने वाले को शीर्ष पर रखो और जब पूरी तरह शक्ति संपन्न हो जाओ तो अपना असली चेहरा सामने लाओ. शायद इसलिए वाजपेयी को प्रधानमंत्री बनाया गया था जबकि हिंदुत्व के नारे का इस्तेमाल कर भाजपा को इतनी सीटें दिलवाने का श्रेय आडवाणी को था. अब जबकि श्री वाजपेयी ने सन्यास ले लिया है उनका स्थान भी किसी ऐसे व्यक्ति को लेना पड़ेगा जो व्यवहार और स्वभाव से कट्टरपंथी न नजर आए. आडवाणी इस काम के लिए पूरी तरह उपयुक्त हैं. बाद में जब भाजपा पर्याप्त ताकत प्राप्त कर लेगी तब मोदी सामने आएंगे. मोदी, जो कि आशीष नंदी के शब्दों में अपने चेहरे-मोहरे से ही फासिस्ट नजर आते हैं, भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने के संघ के स्वप्न को पूरा करने के लिए नेपथ्य में इंतजार कर रहे हैं.


आडवाणी की पुस्तक इस अर्थ में डरावनी है कि वो दिखाती है कि किस तरह संघ की शाखाओं में बांटी जा रही सांप्रदायिकता की कड़वी, जहरीली गोली को चाशनी का लेप लगाकर प्रस्तुत किया जा सकता है. हिंदू राष्ट्र के इस सिपाही ने यह काम बखूबी किया है.

 

04.05.2008, 00.34 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Jeet Bhargava

 
 Raam Puniyaani jaise psudo-secular aur Hindu-dveshi insaan se aise hi aarticle ki aashaa ki jaati hai. Din-raat apna political agenda lekar chalnevaale aise lekhako ko ravivaar jaisi prathishthit site par dekhna dukhad hai. 
   
 

anwar suhail(anwarsuhail_09@yahoo.co.in)

 
 adwani ka asli chehra dikhlane ke liye dhanyawad 
   
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