पहला पन्ना प्रतिक्रिया   Font Download   हमसे जुड़ें RSS Contact
larger
smaller
reset

इस अंक में

 

आदिवासी, नक्सली और भारतीय लोकतंत्र

देश को ले डूबेगा परमाणु समझौता

फिर बाढ़ उत्सव !

नदी के लिए जंग

ओ मैक्लुस्कीगंज !

निशाने पर मीडिया

क्रूर समाज में एक मानवीय चेहरा

जातीय पंचायत की बलि

स्वयंवर में चुने गए राम

फिर बाढ़ उत्सव !

आदिवासी, नक्सली और भारतीय लोकतंत्र

देश को ले डूबेगा परमाणु समझौता

किए कराए पर मुहर

अनूठा संपादक

प्रदूषण का घर पलक्कड

मेरे न रहने पर

आयी मुझ तक

उसका चेहरा

मेरे उस्ताद मेहदी हसन

 
 पहला पन्ना > कला > बात पते कीPrint | Send to Friend 

Save and share article:
Delicious
Reddit
Stumbleupon
Newsvine
किए कराए पर मुहर इनकी कृष्ण राघव

किए कराए पर मुहर इनकी
कृष्ण राघव


 

‘री–मेक’ की लहर आ गई है.

जी, मैं फिल्मों की नकल की बात कर रहा हूं. ऐसा नहीं है कि ‘री-मेक’ पहले नहीं हुए.... केवल ‘राजा हरीशचंद्र’ के चरित्र पर ही, अलग-अलग नामों से बीसियों बार प्रयास हुआ, ‘देवदास’ साढ़े तीन बार बन चुकी है (गुलज़ार वाली अधूरी रह गई थी). ‘तानसेन’ पर भी दो बार प्रयास हुआ. ‘परिणीता’ तीन बार बनी (एक बार नाम दूसरा था). ‘अनारकली’ की कथा भी ‘मुगले आज़म’ में फिर से दोहराई गई.

 

‘चित्रलेखा’ को स्वयं केदार शर्मा ने दो बार बनाया (मेहताब और मीना कुमारी के साथ). महबूब खान ने अपनी ‘औरत’ को दोबारा ‘मदर इंडिया’ के नाम से पेश किया (सरदार अख़्तर और नरगिस). बीच में यह सिलसिला थोड़ा सा टूटा जरूर, किंतु लगता है कि या तो निर्माता – निर्देशक अपना आत्म-विश्वास खो बैठे हैं अथवा बचपन/किशोरावस्था में देखी फिल्में उनकी पीछा नहीं छोड़ रही हैं अतः अपने ढंग से उन फिल्मों को दोबारा फिल्माने का कीड़ा उनके मन में कुलबुला रहा है या फिर.... अब क्या कहें !

1953 में भी बनी थी परिणीता

1953 में विमल राय ने जो ‘परिणीता’ बनाई थी, वह किसी भी क्षेत्र में कल-परसों वाली ‘परिणीता’ से कमतर नहीं.

 

‘राजा हरीशचंद्र’ कितनी बार भी पर्दे पर आएं हों, उनकी कभी कोई गंभीर चर्चा नहीं हुई. विषयवस्तु एवं चरित्र के कारण भारत की जनमानस ऐसी फिल्म को कितनी भी बार देख सकता है. इसी प्रकार विजय भट्ट ने ‘राम-राज्य’ दो बार बनाई. दोनों ही बार देखी भी गई, रामलीला हर वर्ष देखी जाती है. उसमें भी फिल्म का नहीं राम के चरित्र का ही प्रताप है. दद्दा मैथिलीशरण गुप्त ने कहा था –


“राम तुम्हारा चरित्र, स्वयं ही काव्य है
कोई कवि बन जाय, सहज संभाग्य है“

सो ऐसी फिल्मों में चरित्र की महिमा ही रंग लाती है फिर चरित्र चाहे तानसेन का हो कि देवदास का, परिणीता हो कि उमराव जान, अनारकली हो कि चित्रलेखा! यहां तक कि काल्पनिक चरित्र भी यदि सशक्त हो तो दर्शक को दोबारा – तिबारा खींच लाते हैं जैसे ‘औरत’ / ‘मदर इंडिया’, ‘डॉन’ अथवा कोई और .... किन्तु इधर ‘री-मेक’ करने वालों की निष्ठा पर प्रश्नचिन्ह-सा लग रहा है. क्या बासी कढ़ी को फिर से उबाल कर वे उसी स्वाद को वैसा ही परोसने की कल्पना कर बैठे हैं ? क्या ऐसा संभव है! संभव केवल यही होता है कि, “पहले जैसी नहीं बनी”. यों तो अपने एक साक्षात्कार में हमारे महान अभिनेता अमिताभ बच्चन ने भी यह उत्तर देकर ‘री-मेक’ परंपरा को बल देने का प्रयास किया है कि इसमें हर्ज ही क्या है. यह तो पुरानी फिल्म को मान्यता देने जैसा ही है किंतु क्या पुरानी फिल्म की मान्यता समाप्त हो गई ?


पुरानी ‘उमराव जान’ अपनी पहचान के लिए नई ‘उमराव जान’ की मोहताज़ नहीं है. ‘हरीशचंद्र’ कितने भी आए कितु प्रासंगिकता केवल इसी बात की है कि सन 1913 में हिंदी की पहली फिल्म दादा साहब फाल्के ने बनाई, वह ‘राजा हरीशचंद्र’ थी. बाकी फिल्में इसी नाम की आईं और गई.

‘परिणीता’ (1953) जो विमल राय ने बनाई थी, वह निर्माण के किसी भी क्षेत्र में कल-परसों वाली ‘परिणीता’ से कमतर नहीं. बल्कि वेशभूषा, देशकाल और वातावरण को लेकर बाद वाली ने कई समझौते किये, `आइटम सॉंग’ के लिए रेखा तक को उतारना पड़ा किंतु महान विमल दा ने ऐसा कुछ भी नहीं किया था; उन्हें आवश्यकता ही नहीं थी.

‘मदर इंडिया’, ‘मुगले आज़म’ तथा ‘देवदास’ (दिलीप कुमार – सुचित्रा सेन) 1955 वाली को छोड़ दें तो सारी ही पहली फिल्में अपने ‘री-मेक’ से कहीं अधिक याद की जाती हैं तथा हरेक ‘रीमेक’ (कुछ अपवादों को छोड़कर) लचर ही होता है. कारण यह कि आप पुरानी फिल्म की ‘ऐतिहासिकता’ को नहीं मिटा सकते. जो लोग किए-कराए काम पर अपनी मुहर लगा कर पैसे कमाना चाहते हैं, मुँह की खाते हैं.

जहां तक साहित्यिक कृतियों का प्रश्न है, उनमें भी एक बात समझ में नहीं आती कि कृति में यदि हेर-फेर करके ही काम चलाना है, केवल शीर्षक तथा लेखक के नाम का ही लाभ उठाना है तो जनता मूर्ख है क्या ? टिकट खिड़की के नाम पर भौंडे नृत्य, गीत, संवाद, काल्पनिक पात्र तथा अलग से जोड़ी हुई घटनाएं ही दिखानी हैं, तो उसका नाम भी बदल डालिए ना !

ऐसा न करके निर्माता–निर्देशक ही घाटे में रहते हैं. ‘उमराव जान’ पाँच बार बनी है. दो बार इसी नाम से, तीन बार अलग-अलग नामों से, कितने दुःख की बात है कि ‘उमराव जान अदा’ एक बार भी नहीं बनी. उमराव जान शायरा थीं, ‘अदा’ तख़ल्लुस रखती थीं ; अपने उपन्यास में मिर्ज़ा हादी रुसवा ने उनकी शायरी तथा ग़ज़लें आदि भी दी हैं. किंतु पाँच फिल्मों में से किसी में भी उन्हें स्थान नहीं मिला. जबकि उमराव जान ‘अदा’ की शायरी किसी भी तरह निम्न स्तरीय नहीं है. बानगी के लिए दो शेर प्रस्तुत हैं जो उसी उपन्यास से हैं और उमराव जान, ‘अदा’ के हैं ;

“कोई बद ही नहीं शायद मोहब्बत के फ़साने की
सुनाता जा रहा है, जिसको, जितना याद होता है.”

“कुत्फ़ है कौन सी कहानी में
आपबीती कहूं की जगबीती”

 

04.05.2008, 00.11 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

रवींद्र व्यास (ravindrasvyas@gmail.com)

 
 हिंदी में री-मेक पर कृष्ण राघवजी का लेख पढ़ा है और बेहद निराशा हुई क्योंकि इसमें एक भी नई बात पढ़ने को नहीं मिली। वे इस मीडियम से जुड़े हैं तो हो सकता है मैंने कुछ ज्यादा अपेक्षा के साथ इसे पढ़ना शुरू किया था। री-मेक की लहर कोई आज-कल-परसों नहीं उठी है, यह सालों से जारी है। उमराव जान को लेकर उन्होंने जो कमेंट्स किए हैं उनसे मैं घोर असहमत हूं क्योंकि उन्होंने उमराव जान पर बनी फिल्मों की तुलना करते हुए कमजोर तर्क दिए हैं। क्या उन्हें लगता है कि उमराव जान में उमराव जान अदा की शायरी देने से वह फिल्म उम्दा बन जाती। क्या उमराव जान में शहरयार की गजलों का इस्तेमाल करने से उमराव जान का दुःख-दर्द सांद्र होकर हम तक नहीं पहुंचता? सवाल ये नहीं है कि उमराव जान अदा में उमराव जान की लिखी शायरी का इस्तेमाल हुआ है या नहीं। सवाल यह है कि फिल्म में अपनी मीडियम की गहरी समझ रखते हुए एक सिनेमेटिक अनुभव में रूपांतरित किया जा सका है या नहीं। मैंने दो ही उमराव जान देखी हैं और दोनों की तुलना करें तो संगीत हो या गीत, अभिनय हो निर्देशन हर स्तर पर मुजफ्फर अली, जेपी दत्ता से बहुत-बहुत बेहतर हैं। आश्चर्य है राघवजी ने इतनी सतही टिप्पणी कैसे दे दी?
रवींद्र व्यास, इंदौर
 
   
सभी प्रतिक्रियाएँ पढ़ें

इस समाचार / लेख पर अपनी प्रतिक्रिया हमें प्रेषित करें

  ई-मेल (केवल English में लिखें)
  ई-मेल अन्य विजिटर्स को भी दिखाई दे ।
  ई-मेल अन्य विजिटर्स को ना दिखाई दे ।
  नाम (English अथवा हिन्दी)
  स्थान
  प्रतिक्रिया
   

 

  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2008 Vikalp, INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.co.in