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24 घंटे मौत से घिरा रहा लादेन

और बड़े हमले कर सकता है लादेन

ऐसे हुई लादेन से मुलाकात-2

 

  • लादेन 9/11 जैसे बल्कि उससे कहीं अधिक खतरनाक हमलों को अंजाम देने पर आमादा.
  • हमले के लिए ब्रिटेन और इटली सबसे संभावित लक्ष्य.
  • 9/11 से पहले अल कायदा बहुत थोड़े से देश में सक्रिय था लेकिन अब यह 62 देशो में सक्रिय.

 

हामिद मीर

इस्लामाबाद से

 

वर्ष 2002 में पूरे साल ओसामा बिन लादेन भूमिगत रहा. वह और उसके साथी लगातार भागते रहे. वे बार-बार अपना ठिकाना बदलते रहे. वे अपनी जान बचाने को आमादा था इसलिए इस दौरान उन्होंने कोई लड़ाई नहीं की. लादेन से मुलाकात की पहली किश्त

 

अप्रैल 2003 में इराक पर अमेरिकी हमले के बाद ही दुनिया का सबसे वांछित शख्स एक बार फिर अफगानिस्तान में नजर आया. उसने कहा- वे हमें अफगानिस्तान में पकड़ें इससे पहले उन्हें इराक में पकड़ डालो. उसने एलान किया कि सैफ उल आदिल इराक में अमेरिकी विरोध की अगुवाई करेगा, इसके साथ ही उसने आदिल से कहा कि वह अबु मुसाब अल जवाहिरी से संपर्क करे जो कि उस समय इरान में कहीं छिपा हुआ था.

फंसने पर भी लड़ने का हौसला

2004 में जब लादेन को ब्रिटिश फौज ने घेर लिया तब भी वह सामने से लड़ाई के लिए तैयार था

 

बिन लादेन ने कुनार और पाक्तिया में अपने साथियों के छोटे-छोटे समूहों को संबोधित करना शुरू किया. कुनार की पहाड़ियों में प्रसव के दौरान उसकी एक बहु की मौत हो गई. उसकी बहु की मैय्यत में बहुत सारे लोग जुटे थे. स्थानीय अफगानों को जब उसकी मौत के बारे में पता चला तो उन्होंने कुनार में ब्याहे गए अल कायदा के लड़ाकों के घरों में जाकर शोक जताया.

 

इस घटना की खबरें अमेरिकियों को भी पता चल ही गईं. इसके बाद अमेरिका ने कुनार में एक ऑपरेशन शुरू किया लेकिन पेच घाटी में बमबारी शुरू होने से पहले एक बार फिर ओसामा बिन लादेन दक्षिण की और भागने में कामयाब हो गया.

24 घंटे मौत के
2004 के आखिर में बिन लादेन ने खुद को दक्षिणी अफगान प्रांत हेलमंड में ब्रिटिश फौज से घिरा हुआ पाया. त्रिस्तरीय रक्षा पंक्ति के साथ लादेन एक पहाड़ी इलाके में छिपा हुआ था. उच्च स्तरीय कूटनीतिक सूत्रों ने इन पंक्तियों के लेखक को पिछले दिनों काबुल में बताया था कि ब्रिटिश फौज इतनी नजदीक पहुंच चुकी थी कि वह ओसामा बिन लादेन को जिंदा या मृत पकड़ सकती थी. दुनिया की ताकतवर सेनाओं में से एक से बचने के लिए वह 24 घंटे तक घिरा रहा लेकिन एक बार फिर वह मौत को दगा दे गया.

 

हेलमंड में तालिबानी सूत्रों से मिली जानकारी के आधार पर ब्रिटिश फौज उस इलाके में पांच किलोमीटर के दायरे में अल कायदा की दो रक्षा पंक्तियों को तोड़ने में कामयाब हो गई थी. आमने-सामने की लड़ाई शुरू होने वाली थी लेकिन शाम ढल चुकी थी और अंधेरा घिरने से अल कायदा को राहत मिल गई. ओसामा बिन लादेन सामने से लड़ाई करना चाहता था लेकिन उसके सहयोगियों ने उसे रोक दिया.

 

उनके बीच इसे लेकर गरमागरम तकरार भी हुई. बिन लादेन नाराज हो गया था लेकिन अबू हमजा अलजाजरी ने उसे भागने की कोशिश करने के लिए मना लिया. उन्होंने झांसा देने के लिए दो दिशाओं में टाइमरयुक्त राकेट लगा दिए. उन्होंने शत्रु का भीतरी घेरा तोड़ने का फैसला किया और पैदल लड़ाकों के साथ तीसरी दिशा की ओर आगे बढ़ गए. इस समूह ने बिन लादेन की घेराबंदी की. अधिकांश लड़ाके मारे गए लेकिन लादेन भाग निकलने में सफल हो गया. ओसामा बिन लादेन अबू हामजा अल जाजरी के साथ ब्रिटिश फौज के हाथ में आने से बच गया.

 

इन सूत्रों ने इस बात का खंडन किया कि बिन लादेन ने अपने गार्ड्स से कहा था कि यदि उसके पकड़े जाने की नौबत आए तो वे उसे गोली मार दें. अल कायदा के सूत्रों ने दावा किया कि खुदकुशी में उसका यकीन नहीं है. वह अपने शत्रुओं से लड़ते हुए शहीद होना पसंद करेगा.

मौत की अफवाह
हेलमंड की घटना के बाद ओसामा बिन लादेन पर उसके करीबी लोगों ने काफी बंदिशें लगा दी हैं. उसके बच निकलने के पीछे यह भी एक सच है. वह अपने खुद के फैसलों पर यकीन करने के बजाए अपने सहयोगियों के बहुमत की राय पर यकीन करता है. उसके अधिकांश सहयोगियों ने उससे कहा है कि वह अपनी गतिविधियां सीमित कर दे, सेटेलाइट फोन का इस्तेमाल न करे और खुद लड़ने के बजाए प्लानिंग में अपना ध्यान केंद्रित करे.

 

उसे यहां तक सलाह दी गई है कि वह सिर्फ खास मौकों पर ही बयान जारी किया करे. पिछले साल उसने अपनी मौत से संबंधित खबरों का खंडन करना उसने जरूरी नहीं समझा. पिछले दो सालों से अल कायदा के संदेश डा. अयमान अल जवाहरी द्वारा जारी किए जा रहे हैं. मिस्र का यह डाक्टर लगातार अपने नेता के संपर्क में रहता है लेकिन वे रहते अलग-अलग हैं.

 

डा. जवाहरी अधिकांश समय पाकिस्तान के कबायली इलाकों में रहता है तो ओसामा बिन लादेन अब भी अफगानिस्तान को पाकिस्तान के मुकाबले महफूज मानता है. उसकी दिलचस्पी पाकिस्तानी फौज से लड़ने के मुकाबले नाटो फौज का विरोध करने में है. पूर्व और दक्षिण अफगानिस्तान के अनेक तालिबान नेता अब पिछले तीन सालों के दौरान दुनिया के सबसे वांछित शख्स से हुई अपनी मुलाकातों की कहानियां बढ़-चढ़कर सुनाते हैं. वे अब मानते हैं कि शेख अमेरिका के खिलाफ उनकी लड़ाई लड़ रहा है, शेख जीत रहा है और महाशक्ति परास्त हो रहा है.

 

1999 में ओसामा बिन लादेन के सिर पर सिर्फ 50 लाख अमेरिकी डॉलर का इनाम था, 9/11 के बाद इसे 2.5 करोड़ डॉलर कर दिया गया था और 2007 में इसे बढ़ाकर 5 करोड़ डॉलर कर दिया गया. 9/11 से पहले अल कायदा बहुत थोड़े से देश में ही सक्रिय था लेकिन अब यह 62 देशो में सक्रिय है और अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश, भारत, सउदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, यमन, जार्डन, कुवैत, मिस्र, लिबिया, लेबनान अल्जरिया, ट्युनिश, मारिटैनिया, सुडान, सोमालिया, इथोपिया, दक्षिण अफ्रीका, मलेशिया, इंडोनेशिया, थाईलैंड, फिलीपींस, उराग्वे, इक्वाडोर, मैक्सिको, अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली, स्पैन और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में उसके सक्रिय सेल मौजूद हैं.

अमेरिका विरोध की आग
9/11 से पहले ओसामा बिन लादेन मुस्लिम दुनिया में कोई खास लोकप्रिय नहीं था, लेकिन आज वह कहीं ज्यादा लोकप्रिय हो गया है. उसके कुछ आलोचक मानते हैं कि वह भूल से लोकप्रिय हो गया है. दरअसल जो लोग अमेरिकी नीति का विरोध करते हैं वे सिर्फ प्रतिक्रिया जताने के लिए ही ओसामा बिन लादेन को पसंद करते हैं. उसकी असल ताकत अमेरिका की गलत नीतियां हैं. 9/11 के बाद दुनिया कहीं अधिक असुरक्षित हो गई है.

 

अमेरिका ने अफगानिस्तान में युद्ध खत्म होने से पहले ही इराक पर हमला करके उसे एक तरह से राहत दी. 9/11 को जितने अमेरिकी मारे गए थे उससे कहीं ज्यादा मुसलमान अफगानिस्तान और इराक में मारे जा चुके हैं. लिहाजा पूरी मुस्लिम दुनिया अमेरिका विरोध की लपटों में जल रही है और इस हालात में सिर्फ ओसामा बिन लादेन को ही फायदा हो रहा है.

अब तक ओसामा बिन लादेन को पकड़ा नहीं जा सका है. 9/11 की तरह का कोई नया हमला सभ्यताओं के बीच संघर्ष को हवा दे सकता है. ओसामा बिन लादेन यही चाहता है.

वह 9/11 जैसे बल्कि उससे कहीं अधिक खतरनाक हमलों को अंजाम देने पर आमादा है. उसके शुभचिंतक दावा करते हैं कि उसकी हिट लिस्ट में सिर्फ अमेरिका नहीं है. अल कायदा अन्य पश्चिमी देशों पर भी हमले करने में सक्षम है. ब्रिटेन और इटली सबसे संभावित लक्ष्य हैं क्योंकि इन्होंने इराक पर हमले के बाद अमेरिका का अंध समर्थन किया. इन सभी देशों के लिए ओसामा बिन लादेन खतरा है लेकिन अब तक उसे पकड़ा नहीं जा सका है. 9/11 की तरह का कोई नया हमला सभ्यताओं के बीच संघर्ष को हवा दे सकता है. ओसामा बिन लादेन यही चाहता है.

 

पिछले छह सालों में मैंने अमेरिका और ब्रिटेन के अनेक अधिकारियों के साक्षात्कार लिए हैं, मैंने कोंडोलिजा राइस, टोनी ब्लेयर और अमेरिका के शीर्ष जनरल रिचर्ड मेयर से लेकर अफगानिस्तान में ब्रिटिश कमांडर डेविड रिचर्ड तक से पूछा है कि आखिर ओसामा बिन लादेन को अब तक पकड़ा क्यों नहीं जा सका है. उनके पास कोई जवाब नहीं था. राइस और ब्लेयर ने मुझसे दो टूक कहा कि वे सभ्यताओं के संघर्ष में यकीन नहीं करते लेकिन उनकी कार्रवाइयां उनके शब्दों से मेल नहीं खाती.

 

पाकिस्तान में अमेरिकी फौज के प्रवेश की धमकी देकर और सलमान रश्दी जैसे लोगों को सम्मानित करके वे सिर्फ ओसामा बिन लादेन का हाथ ही मजबूत कर रहे हैं. वे जितनी ज्यादा घृणा का निर्माण कर रहे हैं लादेन उतना ही ताकतवर होता जा रहा है. उसने सात साल पहले दुनिया बदल दी और वह और बड़ा हमला करके दुनिया को बड़े टकराव की ओर धकेल सकता है.

 

लादेन को पकड़ना मुश्किल ही नहीं...., पढ़ें अगले सप्ताह

11.05.2008, 17.20 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Deepak Kumar Gond(deepak_gond@yahoo.co.in)

 
 i am also not satifited.this matter 
   
 

dineshjaiswal(dineshccna85@gmail.com)

 
 i am not satifited.this matter 
   
 

N.N.Cfhaturvedi(narendranath_c@yahoo.com)

 
 good aproach to sort out the basic problem but not only the wrong policies of Amerca are responsible but ,the wrong understanding of religion is also initiating the path of violence 
   
 

dineshkumargarga@yahoo.co.in(feedback@raviwar.com.)

 
 a very fit article. thanks a lot.pls supply us with more details about areas and subjects relating NWFP and other Moslem countries traditionally & historically linked with India.thaks again.ginesh kumar garg. Lucknow  
   
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