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आदिवासी, नक्सली और भारतीय लोकतंत्र

आदिवासी, नक्सली और भारतीय लोकतंत्र

 

रामचंद्र गुहा

अनुवादः अभिषेक श्रीवास्तव


यह आलेख इस तथ्य को स्थापित करता है कि भारत में विकास और लोकतंत्र का लाभ छह दशकों के दौरान समूचे आदिवासी समाज को सबसे कम प्राप्त हुआ है और उसने सबसे ज्यादा गंवाया है. लेख में इस बात के साक्ष्य मौजूद हैं कि यह तबका दलितों से भी ज्यादा वंचित है. हालांकि, आदिवासी अपने असंतोष को लोकतांत्रिक और चुनावी प्रक्रिया के माध्यम से प्रभावी रूप से आवाज़ दे पाने में अक्षम रहे हैं, जबकि दलितों को यह मौका मिला है. आदिवासियों के संदर्भ में राज्य और समूचे राजनीतिक ढांचे की विफलता ने ही माओवादी क्रांतिकारियों को इनके बीच प्रवेश करने का अवसर और जगह प्रदान किया है. आदिवासियों के बीच नक्सली प्रभाव के कारणों की पड़ताल के बाद यह आलेख निष्कर्ष देता है कि आदिवासी भारत के मौजूदा दौर में दो त्रासदियों का शिकार बन कर रह गया है. पहली त्रासदी यह है कि राज्य ने अपने ही आदिवासी नागरिकों के प्रति अहसान भरा नज़रिया रखते हुए उपेक्षापूर्ण व्यवहार किया है, और दूसरी यह कि उनके संरक्षक माने जाने वाले नक्सलियों के पास भी उनके लिए कोई दीर्घकालिक समाधान मौजूद नहीं है.

समाजशास्त्री वॉल्टर फर्नांडिस का आकलन है कि सरकारी परियोजनाओं के द्वारा विस्थापित कुल आबादी का 40 फीसदी आदिवासी मूल का है.


जवाहर लाल नेहरू ने 13 दिसम्बर 1946 को संविधान सभा में संकल्प प्रस्ताव रखा था जिसमें यह घोषणा की गई थी कि जल्द ही औपनिवेशिक दासता से मुक्त होने वाले इस राष्ट्र का चरित्र 'स्वतंत्र सम्प्रभु गणराज्य' का होगा. इसका संविधान अपने नागरिकों को 'सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय; अवसरों और दर्जे की समानता; तथा कानून के समक्ष व सार्वजनिक नैतिकता और कानून के दायरे में विचार, अभिव्यक्ति, आस्था, विश्वास, उपासना, व्यवसाय, संगठन और कार्रवाई की स्वतंत्रता' की गारंटी देगा.

प्रस्ताव में आगे कहा गया था, 'अल्पसंख्यकों, पिछड़ों, आदिवासी इलाकों, उत्पीड़ितों और अन्य पिछड़े तबकों के लिए पर्याप्त सुरक्षा कवच मुहैया कराया जाएगा....' प्रस्ताव रखते वक्त नेहरू ने गांधी की भावना और 'भारत के महान अतीत' के साथ ही फ्रेंच, अमेरिकी और रूसी क्रांति जैसी आधुनिक राजनीतिक परिघटनाओं की भी हवाला दिया था.

संकल्प प्रस्ताव पर बहस पूरे एक सप्ताह तक चलती रही जिसमें वक्ताओं में प्रमुख थे- संरक्षणवादी हिंदू पुरुषोत्तमदास टंडन, दक्षिणपंथी हिंदू श्यामा प्रसाद मुखर्जी, दलित नेता बी आर अम्बेडकर, अधिवक्ता एम. आर. जैकर, समाजवादी एम. आर. मसानी, अग्र्रणी महिला आंदोलनकारी हंसा मेहता और कम्युनिस्ट सोमनाथ लाहिड़ी. इन तमाम दिग्गजों के बाद ईसाई धर्म अपना चुके एक पूर्व हॉकी खिलाड़ी जयपाल सिंह बोलने के लिए उठे और उन्होंने शुरुआत कुछ यूं की-

“ एक जंगली और एक आदिवासी के तौर पर मुझसे उम्मीद नहीं की जाती है कि मैं इस प्रस्ताव की सूक्ष्म कानूनी जटिलताओं को समझूंगा. लेकिन, मेरी सामान्य समझ यह कहती है कि हम सबको मिलकर स्वतंत्रता के रास्ते पर आगे बढ़ना चाहिए और साथ लड़ना चाहिए. मान्यवर, यदि भारतीय जनता का कोई भी ऐसा समूह है जिसके साथ दरिद्रतापूर्ण व्यवहार किया गया है, तो वे मेरे लोग हैं. पिछले 6000 वर्षों से इनकी उपेक्षा की जा रही है और इनके साथ अपमानजनक व्यवहार हो रहा है. सिंधु घाटी सभ्यता का इतिहास जिसकी मैं पैदाइश हूं, स्पष्ट तौर पर यह दिखाता है कि यहां आए अतिक्रमणकारियों ने ही मेरे लोगों को सिंधु घाटी से जंगलों में खदेड़ दिया था. जहां तक मेरा सवाल है, यहां मौजूद आप में से अधिकतर इन्हीं में शामिल हैं. हमारे लोगों का सम्पूर्ण इतिहास बाहर के आक्रमणकारियों द्वारा निरंतर शोषण और बेदखली का इतिहास रहा है, जिस पर समय-समय पर विद्रोहों और असंतोष ने लगाम कसने का काम किया है. इसके बावजूद मैं पंडित जवाहर लाल नेहरू के शब्दों पर विश्वास जाहिर करता हूं. मैं आप सभी के शब्दों पर भरोसा जाहित करता हूं कि अब हम एक नया अध्याय शुरू करने जा रहे हैं-स्वतंत्र भारत का नया अध्याय जहां अवसरों की समानता होगी और जहां किसी की भी उपेक्षा नहीं की जाएगी.”

साठ साल बीत गए जब जयपाल ने नेहरू और अन्य लोगों के शब्दों को पकड़ा था. सवाल उठता है कि इस वक्त उनके लोगों यानी आदिवासियों का भाग्य कहां तक पहुंचा है? यह आलेख तमाम तरीकों से इस तर्क को स्थापित करेगा कि भारतीय प्रायद्वीप के आदिवासी लोकतांत्रिक विकास के छह दशकों के अचिन्हित शिकार रहे हैं. उन्हें इस दौरान लगातार व्यापक आर्थिक और राजनीतिक तंत्र द्वारा शोषित और बेदखल किया जाता रहा है (ठीक इसी दौरान बेदखली की इस प्रक्रिया के समानान्तर भड़के असंतोष और विद्रोहों ने इस पर लगाम भी कसी). ध्यान देने वाली बात यह है कि यदि हम अन्य अवसरविहीन समूहों जैसे दलितों और मुस्लिमों के साथ आदिवासियों की सनातन वंचना की तुलना करें, तो यह हमें चौंकाता है. एक और जहां लोकतंत्र व प्रशासन पर राष्ट्रीय विमर्शों को आकार देने और गढ़ने में दलितों और मुस्लिमों का कुछ प्रभाव मौजूद रहा है, वहीं दूसरी ओर इनकी तुलना में आदिवासी न सिर्फ हाशिए पर बल्कि अदृश्य रहे हैं.
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